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Tuesday, May 25, 2021

जीवन का अंग- तुलसी

 *#तुलसी जी, पौधा नहीं जीवन का अंग हैं--*



1. तुलसी जी को नाखूनों से कभी नहीं तोड़ना चाहिए।


2.सांयकाल के बाद तुलसी जी को स्पर्श भी नहीं करना चाहिए।


3. रविवार को तुलसी पत्र नहीं तोड़ने चाहिए।


4. जो स्त्री तुलसी जी की पूजा करती है। उनका सौभाग्य अखण्ड रहता है। उनके घर सुख शांति व समृद्धि का वास रहता है घर का आबोहवा हमेशा ठीक रहता है।


5. द्वादशी के दिन तुलसी को नहीं तोड़ना चाहिए।


6. सांयकाल के बाद तुलसी जी लीला करने जाती हैं।


7. तुलसी जी वृक्ष नहीं हैं ! साक्षात् राधा जी का स्वरूप हैं।


8. तुलसी के पत्तो को कभी चबाना नहीं चाहिए।


तुलसी के पौधे का महत्व धर्मशास्त्रों में भी बखूबी बताया गया है। 


तुलसी के पौधे को माता लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। 


हिंदू धर्म में तुलसी के पौधे से कई आध्यात्मिक बातें जुड़ी हैं। 


शास्त्रीय मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु को तुसली अत्यधिक प्रिय हैं। 


तुलसी के पत्तों के बिना भगवान विष्णु की पूजा अधूरी मानी जाती है। क्योंकि भगवान विष्णु का प्रसाद बिना तुलसी दल के पूर्ण नहीं होता है। 


तुलसी की प्रतिदिन का पूजा करना और पौधे में जल अर्पित करना हमारी प्राचीन परंपरा है। 


मान्यता है कि जिस घर में प्रतिदिन तुलसी की पूजा होती है, वहां सुख-समृद्धि, सौभाग्य बना रहता है. कभी कोई कमी महसूस नहीं होती।


जिस घर में तुलसी का पौधा होता है उस घर की कलह और अशांति दूर हो जाती है. घर-परिवार पर मां की विशेष कृपा बनी रहती है।


धार्मिक मान्यताओं के अनुसार तुलसी के पत्तों के सेवन से भी देवी-देवताओं की विशेष कृपा प्राप्त होती है। जो व्यक्ति प्रतिदिन तुलसी का सेवन करता है, उसका शरीर अनेक चंद्रायण व्रतों के फल के समान पवित्रता प्राप्त कर लेता है।


तुलसी के पत्ते पानी में डालकर स्नान करना तीर्थों में स्नान कर पवित्र होने जैसा है। मान्यता है कि जो भी व्यक्ति ऐसा करता है वह सभी यज्ञों में बैठने का अधिकारी होता है।


भगवान विष्णु का भोग तुलसी के बिना अधूरा माना जाता है। इसका कारण यह बताया जाता है कि तुलसी भगवान विष्णु को बहुत प्रिय हैं।


कार्तिक महीने में तुलसी जी और शालीग्राम का विवाह किया जाता है। कार्तिक माह में तुलसी की पूजा करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। 


शास्त्रों में कहा गया है कि तुलसी पूजन और उसके पत्तों को तोड़ने के लिए नियमों का पालन करना अति आवश्यक है।


*तुलसी पूजन के नियम---*


तुलसी का पौधा हमेशा घर के आंगन में लगाना चाहिए। आज के दौर में में जगह का अभाव होने की वजह तुलसी का पौधा बालकनी में लगा सकते है।


रोज सुबह स्वच्छ होकर तुलसी के पौधे में जल दें और एवं उसकी परिक्रमा करें।


सांय काल में तुलसी के पौधे के नीचे घी का दीपक जलाएं, शुभ होता है।


भगवान गणेश, मां दुर्गा और भगवान शिव को तुलसी न चढ़ाएं।


आप कभी भी तुलसी का पौधा लगा सकते हैं, लेकिन कार्तिक माह में तुलसी लगाना सबसे उत्तम होता है।


तुलसी ऐसी जगह पर लगाएं जहां पूरी तरह से स्वच्छता हो।


तुलसी के पौधे को कांटेदार पौधों के साथ न रखें।


*तुलसी की पत्तियां तोड़ने के भी कुछ विशेष नियम हैं---*


तुलसी की पत्तियों को सदैव सुबह के समय तोड़ना चाहिए। अगर आपको तुलसी का उपयोग करना है तो सुबह के समय ही पत्ते तोड़ कर रख लें, क्योंकि तुलसी के पत्ते कभी बासी नहीं होते हैं।


बिना जरुरत के तुलसी को की पत्तियां नहीं तोड़नी चाहिए, यह उसका अपमान होता है।


तुलसी की पत्तियां तोड़ते समय स्वच्छता का पूरा ध्यान रखें।


तुलसी के पौधे को कभी गंदे हाथों से न छूएं।


तुलसी की पत्तियां तोड़ने से पहले उसे प्रणाम करना चाहिए और इस मंत्र का उच्चारण करना चाहिए- "महाप्रसाद जननी, सर्व सौभाग्यवर्धिनी, आधि व्याधि हरा नित्यं, तुलसी त्वं नमोस्तुते"।


बिना जरुरत के तुलसी को की पत्तियां नहीं तोड़नी चाहिए, यह उसका अपमान होता है।


रविवार, चंद्रग्रहण और एकादशी के दिन तुलसी नहीं तोड़ना चाहिए।


"तुलसी वृक्ष ना जानिये।

गाय ना जानिये ढोर।।

गुरू मनुज ना जानिये।

ये तीनों नन्दकिशोर।।


अर्थात:-

तुलसी को कभी पेड़ ना समझें, गाय को पशु समझने की गलती ना करें और गुरू को कोई साधारण मनुष्य समझने की भूल ना करें, क्योंकि ये तीनों ही साक्षात भगवान रूप हैं।


 

 #पोस्ट_अच्छी_लगे_तो_शेयर_जरूर_करें।


#warehouse mind.

Monday, May 24, 2021

गाय से मिल रही मानसिक शांति? अमेरिका में गले लगाने को 200 डॉलर तक दे रहे लोग

गाय एक महत्त्वपूर्ण पालतू पशु है जो संसार में प्रायः सर्वत्र पाई जाती है। इससे उत्तम किस्म का दूध प्राप्त होता है। हमारे देश भारत मे हिन्दू धर्म में गाय को 'माता' (गौमाता) कहते हैं।भारत में वैदिक काल से ही गाय का महत्व रहा है। आरम्भ में आदान-प्रदान एवं विनिमय आदि के माध्यम के रूप में गाय का उपयोग होता था और मनुष्य की समृद्धि की गणना उसकी गोसंख्या से की जाती थी। हिन्दू धार्मिक दृष्टि से भी गाय पवित्र मानी जाती रही है तथा उसकी हत्या महापातक पापों में की जाती है। गोहत्यां ब्रह्महत्यां च करोति ह्यतिदेशिकीम्। यो हि गच्छत्यगम्यां च यः स्त्रीहत्यां करोति च ॥ २३ ॥ भिक्षुहत्यां महापापी भ्रूणहत्यां च भारते। कुम्भीपाके वसेत्सोऽपि यावदिन्द्राश्चतुर्दश ॥ २४ ॥ (देवीभागवतपुराणम्) कोरोना वायरस की दूसरी लहर के चलते इस समय देश और दुनिया का हाल बेहाल है। लोग लगातार जान गंवा रहे हैं। वहीं संक्रमण से बचाव के लिए लॉकडाउन में लोग घरों में कैद से हो गए हैं। ऐसे में डिप्रेशन और एंग्जायटी की समस्या भी आम होती जा रही है। हालांकि लोग अपने-अपने तरीकों से इससे जूझ रहे हैं लेकिन अमेरिका में इसके लिए अनोखी तरकीब निकाली गई है। यहां मानसिक शांति के लिए गाय को गले लगाया जा रहा है।
कोरोना काल में अमेरिका में गाय को गले लगाने के लिए लोग पैसे दे रहे हैं। एक भारतीय नेता द्वारा ट्विटर पर शेयर किए गए सीएनबीसी के एक वीडियो में बताया गया है कि अमेरिका में लोग गाय को गले लगाने के लिए एक घंटे के लिए 200 डॉलर तक का भुगतान कर रहे हैं। उन्होंने लिखा कि साफ है कि भारत इसमें आगे है। यहां गायों को 3000 सालों से पूजा जा रहा है।
तनाव हार्मोन को घटाता है:- डॉक्टरों का कहना है कि गाय को गले लगाने का एहसास घर पर एक बच्चे या पालतू जानवर को पालने के समान है। "एक हग हैप्पी हार्मोन ऑक्सीटोसिन, सेरोटोनिन और डोपामाइन को ट्रिगर करता है, जिससेकोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) को कम करता है। ये तनाव के स्तर, चिंता और अवसाद के लक्षणों को कम करता है।"
इम्यूनिटी को रेगुलेट करता है 'काउ हग':- गाय स्वभाव से शांत, कोमल और धैर्यवान होती हैं और गले लगाने वालों को जानवर उसके गर्म शरीर के तापमान, धीमी गति से दिल की धड़कन और बड़े आकार से फायदा होता है। यह सब शरीर के मेटाबोलिज्म, इम्यूनिटी और तनाव प्रतिक्रिया को रेगुलेट करने में मदद करता है। जय हिंद #warehouse mind

कोरोना में इम्युनिटी बढ़ाने का सबसे अच्छा इलाज:- कटहल

कटहल एक ऐसी सब्जी जो भारत के सभी क्षेत्रों में बड़े ही चाव से खाई जाती है,और यह देश के सभी जगह आसानी से मिलने वाली है।यह हल्की गर्म तासीर का पेड़ है जिसके बहुत ही अनेक लाभ होते हैं।कटहल की मसालेदार सब्जी किसी के भी मुंह में पानी ला सकती है. ये दुनिया के सबसे बड़े फलों में से एक है. कटहल का इस्तेमाल न केवल सब्जी बनाने में बल्क‍ि अचार बनाने में भी किया जाता है।
आवश्यकताओं को पूरा करते हैं. इसमें विटामिन ए, विटामिन सी, थायमीन, पोटैशियम, कैल्शियम, आयरन और जिंक प्रचुर मात्रा में होता है. विटामिन सी(एक एंटीऑक्सिडेंट) का उत्कृष्ट स्रोत होने के नाते, कटहल सफेद रक्त कोशिकाओं के कार्य का समर्थन करके आपकी प्रतिरक्षा को बढ़ावा देता है। यह एंटीऑक्सिडेंट भी शरीर में मुक्त कणों को निष्क्रिय करने में मदद करता है, जिससे सेल झिल्ली और यहां तक कि डीएनए को नुकसान पहुंचता है। आइरन की कमी के कारण एनीमिया को रोकने के लिए कटहल काफ़ी फायदेमंद है। यह लोहे की अच्छी मात्रा प्रदान करता है और लाल रक्त कोशिकाओं के उत्पादन को बढ़ाता है। इसकी उच्च विटामिन सी सामग्री शरीर में लोहे का अवशोषण भी सुधारती है। अन्य खनिज जैसे तांबे और मैग्नीशियम रक्त की गुणवत्ता में सुधार करने में मदद करते हैं। पोषण प्रदान करने के अतिरिक्त, यह रक्त की आपूर्ति को पूरे शरीर में ऑक्सीजन के द्वारा पूरी करने में मदद करता है, जिससे एनीमिया के लक्षणों को कम करने में मदद मिलती है जैसे सुस्ती, निरंतर थकान और पीला रंग। एक स्वस्थ प्रतिरक्षा प्रणाली वायरल और बैक्टीरियल संक्रमणों के खिलाफ एक मजबूत प्रतिरोधक बनता है। यह सामान्य बीमारियों को रोकने में मदद करता है जैसे कि खांसी, सर्दी और फ्लू। केवल 100 ग्राम कटहल से 13.8 मिलीग्राम या 17 प्रतिशत विटामिन सी की आपकी दैनिक आवश्यकता पूरी हो जाती है। उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ चिकित्सक डाक्टर ने कहा है कि कटहल खाने से इम्युनिटी बढ़ जाती है। इसमें विभिन्न प्रकार के पोषक तत्व पाए जाते हैं। इम्युनिटी बढ़ाने में कटहल गुणकारी है। कोरोना महामारी मे इम्युनिटी बढ़ाने के लिए कटहल का उपयोग भी करना चाहिए। डॉक्टर ने कहा है कि कटहल खाने से हमारे शरीर का इम्युनिटी तेजी से बढ़ता है इसमें कैल्शियम और पोटेशियम के कारण मांस पेशियो को मजबूती मिलती है। मैग्नीशियम हड्डियों के लिए अच्छा होता है। इसमें विटामिन सी और ए शरीर मे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने की शक्ति होती है। हृदय रोग मे भी कटहल लाभदायक होता है और उच्च रक्त चाप कम करता है। शहरी क्षेत्रो के लोग कटहल के अचार का अधिक सेवन करते है।
उन्होने कहा कि कोरोना वायरस से संक्रमितो की संख्या तेजी से बढ़ रही है। गर्मी और तेज धूप से लोगो के सेहत पर असर पड़ रहा है। इस समय लोगों को ताजा भोजन करने चाहिए तथा खाने मे मूली,प्याज,टमाटर,नीबू,खीरा,ककड़ी,हरा मिर्च आदि का भी सेवन करनी चाहिए । बासी खाने का सेवन नही करना चाहिए। एक प्रश्न के उत्तर में उन्होने कहा कि खाने के साथ दही या माठे का सेवन नमक मिलाकर किया जाए, तो शरीर को बहुत ही लाभ होगा । विभिन्न प्रकार के पोषक तत्व मिलेंगे और शरीर पूरी तरह से स्वस्थ रहेगा। कोरोना महामारी मे काढ़े का उपयोग बहुत ही लाभदायक है। जय हिंद #warehouse mind.

Monday, October 26, 2020

अमरूद

अमरूद ( वानस्पतिक नाम : सीडियम ग्वायवा, प्रजाति सीडियम, जाति ग्वायवा, कुल मिटसी) एक फल देने वाला वृक्ष है। वैज्ञानिकों का विचार है कि अमरूद की उत्पति वेस्ट इंडीज़ से हुई है।भारत की जलवायु में अमरूद इतना घुल मिल गया है कि इसकी खेती यहाँ अत्यंत सफलतापूर्वक की जाती है। पता चलता है कि १७वीं शताब्दी में यह भारतवर्ष में लाया गया। अधिक सहिष्ण होने के कारण इसकी सफल खेती अनेक प्रकार की मिट्टी तथा जलवायु में की जा सकती है। जाड़े की ऋतु में यह इतना अधिक तथा सस्ता प्राप्त होता है कि लोग इसे निर्धन जनता का एक प्रमुख फल कहते हैं। यह स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभदायक फल है। इसमें विटामिन "सी' अधिक मात्रा में पाया जाता है। इसके अतिरिक्त विटामिन "ए' तथा "बी' भी पाए जाते हैं। इसमें लोहा, चूना तथा फास्फोरस अच्छी मात्रा में होते हैं। अमरूद की जेली तथा बर्फी (चीज) बनाई जाती है। इसे डिब्बों में बंद करके सुरक्षित भी रखा जा सकता है।

अमरूद के सेवन से मिलने वाले 15 फायदे

  1. अमरूद हाई एनर्जी फ्रूट है जिसमें भरपूर मात्रा में विटामिन और मिनरल्‍स पाए जाते हैं। ये तत्व हमारे शरीर के लिए बहुत जरूरी होते हैं।
  2. डीएनए को सुधारे अमरूद में पाया जाने वाला विटामिन बी-9 शरीर की कोशिकाओं और डीएनए को सुधारने का काम करता है।
  3. दिल का साथी अमरूद में मौजूद पोटैशियम और मैग्‍नीशियम दिल और मांसपेशियों को दुरुस्‍त रखकर उन्‍हें कई बीमारियों से बचाता है।
  4. अगर आप अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाना चाहते हैं तो अमरूद का सेवन करना बहुत फायदेमंद होगा।
  5. अमरूद के नियमित सेवन से सर्दी जुकाम जैसी समस्‍याओं के होने का खतरा कम हो जाता है।
  6. अमरूद में पाया जाने वाला विटामिन ए और ई आंखों, बालों और त्‍वचा को पोषण देता है।
  7. अमरूद में मौजूद लाइकोपीन नामक फाइटो न्‍यूट्र‍िएंट्स शरीर को कैंसर और ट्यूमर के खतरे से बचाने में सहायक होते हैं।
  8. अमरूद में बीटा कैरोटीन होता है जो शरीर को त्‍वचा संबंधी बीमारियों से बचाता है।
  9. अमरूद का नियमित सेवन करने से कब्‍ज की समस्‍या में राहत मिलती है।
  10. फल के साथ ही अमरूद की पत्तियों का सेवन मुंह के छालों को दूर करने में कारगर होता है।
  11. अमरूद का रायता, चटनी, अचार और शेक खाने का स्‍वाद बढ़ा देते हैं।
  12. अमरूद मेटाबॉलिज्‍म को सही रखता है जिससे शरीर में कोलेस्‍ट्रॉल का स्‍तर नियंत्रित रहता है।
  13. कच्‍चे अमरूद में पके अमरूद की अपेक्षा विटामिन सी अधिक पाया जाता है। इसलिए कच्‍चा अमरूद खाना ज्‍यादा फायदेमंद होता है।
  14. अमरूद में फाइबर की मात्रा बहुत अधिक होती है इसलिए यह डायबिटिज के मरीजों के लिए बहुत अच्‍छा होता है।
  15. थायरॉइडनॉर्मल थायरॉइड में भी डॉक्‍टर अमरूद खाने की सलाह देते हैं।
  16. अमरूद के पेड़ की पत्तियों को बारीक पीसकर काले नमक के साथ चाटने से लाभ होता है। अमरूद के फल की फुनगी (अमरूद के फल के नीचे वाले छोटे पत्ते) में थोड़ा-सी मात्रा में सेंधानमक को मिलाकर गुनगुने पानी के साथ पीने से पेट में दर्द समाप्त होता है। यदि पेट दर्द की शिकायत हो तो अमरूद की कोमल पत्तियों को पीसकर पानी में मिलाकर पीने से आराम होता है। 

    अपच
    अपच, अग्निमान्द्य और अफारा के लिए अमरूद बहुत ही उत्तम औषधि है। इन रोगों से पीड़ित व्यक्तियों को 250 ग्राम अमरूद भोजन करने के बाद खाना चाहिए। जिन लोगों को कब्ज न हो तो उन्हें खाना खाने से पहले खाना चाहिए।

    बवासीर
    सुबह खाली पेट 200-300 ग्राम अमरूद नियमित रूप से सेवन करने से बवासीर में लाभ मिलता है। कुछ दिनों तक रोजाना सुबह खाली पेट 250 ग्राम अमरूद खाने से भी बवासीर ठीक हो जाती है। बवासीर को दूर करने के लिए सुबह खाली पेट अमरूद खाना उत्तम है। मल-त्याग करते समय बांयें पैर पर जोर देकर बैठें। इस प्रयोग से बवासीर नहीं होती है और मल साफ आता है। पके अमरुद खाने से पेट का कब्ज खत्म होता है, जिससे बवासीर रोग दूर हो जाता है। 

    कब्ज
    अच्छी किस्म के तरोताजा बड़े-बड़े अमरूद लेकर उसके छिलकों को निकालकर टुकड़े कर लें और धीमी आग पर पानी में उबालें। जब अमरूद आधे पककर नरम हो जाएं, तब नीचे उतारकर कपड़े में डालकर पानी निकाल लें। उसके बाद उससे 3 गुना शक्कर लेकर उसकी चासनी बनायें और अमरूद के टुकड़े उसमें डाल दें। फिर उसमें इलायची के दानों का चूर्ण और केसर इच्छानुसार डालकर मुरब्बा बनायें। ठंडा होने पर इस मुरब्बे को चीनी-मिट्टी के बर्तन में भरकर, उसका मुंह बंद करके थोड़े दिन तक रख छोड़े। यह मुरब्बा 20-25 ग्राम की मात्रा में रोजाना खाने से कब्जियत दूर होती है।

    खांसी
    एक कच्चे अमरूद को लेकर चाकू से कुरेदकर उसका थोड़ा-सा गूदा निकाल लेते हैं। फिर इस अमरूद में पिसी हुई अजवायन तथा पिसा हुआ कालानमक 6-6 ग्राम की मात्रा में लेकर भर देते हैं। इसके बाद अमरूद पर कपड़ा लपेटकर उसमें गीली मिट्टी का लेप चढ़ाकर आग में भून लेते हैं पकने के बाद इसके ऊपर से मिट्टी और कपड़ा हटाकर अमरूद को पीस लेते हैं। इसे आधा-आधा ग्राम की मात्रा में शहद के साथ मिलाकर सुबह-शाम रोगी को चटाने से काली खांसी में लाभ होता है। 

    जल्द घाव भरना
    अमरूद की कोमल पत्तियां उबालकर पीने से पुराने दस्तों का रोग ठीक हो जाता है। दस्तों में आंव आती रहे, आंतों में सूजन आ जाए, घाव हो जाए तो 2-3 महीने लगातार 250 ग्राम अमरूद रोजाना खाते रहने से दस्तों में लाभ होता है। अमरूद में-टैनिक एसिड होता है, जिसका प्रधान काम घाव भरना है। इससे आंतों के घाव भरकर आंते स्वस्थ हो जाती है     

                       

  17.  अमरूद कब हो सकता है हानिकारक      शीत प्रकृति वालों को और जिनका आमाशय कमजोर हो, उनके लिए अमरूद हानिकारक होता है। बारिश के मौसम में अमरूद के अंदर छोटे छोटे व्यक्ति को पेट दर्द, अफारा, हैजा जैसे विकार हो सकते हैं। हालांकि ठंड में ताजे अमरूद खाने से फायदेमंद होते हैं, लेकिन यदि कुछ दिन तक पुराने हो जाए तो नहीं खाना चाहिए। इसके बीज सख्म होने के कारण आसानी से नहीं पचते और यदि ये एपेन्डिक्स में चले जाए, तो रोग पैदा कर सकते हैं। अत: इनके बीजों के सेवन से बचना चाहिए। 

Sunday, October 18, 2020

आँवला के औषधीय गुण

आंवला प्रकृति का वरदान:-



वैज्ञानिक नाम
 - रिबीस यूवा-क्रिस्पा

आँवला एक फल देने वाला वृक्ष है। यह करीब २० फीट से २५ फुट तक लंबा झारीय पौधा होता है। यह एशिया के अलावा यूरोप और अफ्रीका में भी पाया जाता है। हिमालयी क्षेत्र और प्राद्वीपीय भारत में आंवला के पौधे बहुतायत मिलते हैं। इसके फूल घंटे की तरह होते हैं। इसके फल सामान्यरूप से छोटे होते हैं, लेकिन प्रसंस्कृत पौधे में थोड़े बड़े फल लगते हैं। इसके फल हरे, चिकने और गुदेदार होते हैं। स्वाद में इनके फल कसाय होते हैं।संस्कृत में इसे अमृता, अमृतफल, आमलकी, पंचरसा इत्यादि, अंग्रेजी में 'एँब्लिक माइरीबालन' या इण्डियन गूजबेरी (Indian gooseberry) तथा लैटिन में 'फ़िलैंथस एँबेलिका' (Phyllanthus emblica) कहते हैं। यह वृक्ष समस्त भारत में जंगलों तथा बाग-बगीचों में होता है। इसकी ऊँचाई 20 से 25 फुट तक, छाल राख के रंग की, पत्ते इमली के पत्तों जैसे, किंतु कुछ बड़े तथा फूल पीले रंग के छोटे-छोटे होते हैं। फूलों के स्थान पर गोल, चमकते हुए, पकने पर लाल रंग के, फल लगते हैं, जो आँवला नाम से ही जाने जाते हैं। वाराणसी का आँवला सब से अच्छा माना जाता है। यह वृक्ष कार्तिक में फलता है।

आयुर्वेद में आंवला सर्वाधिक स्वास्थ्यवर्धक माना गया है। आंवला विटामिन सी का सर्वोतम प्राकृतिक स्रोत है। इसमें विद्यमान विटामिन सी नष्ट नहीं होता। आंवला दाह, पांडु, रक्तपित्त, अरूचि, त्रिदोष, दमा, खांसी, श्वांस रोग, कब्ज, क्षय, छाती के रोग, हृदय रोग, मूत्र विकार आदि अनेक रोगों को नष्ट करने की शक्ति रखता है। यह पौरूष को बढ़ाता है। सिर के केशों को काले, घने व लम्बे रखता है। विटामिन−सी एक ऐसा नाजुक तत्व होता है जो गर्मी के प्रभाव से नष्ट हो जाता है, लेकिन आंवले का नष्ट नहीं होता। हिंदू धर्म में आंवले का पेड़ व फल दोनों ही पूज्य हैं। कहा जाता है कि आंवले का फल भगवान विष्णु को पूज्य है।  

मान्यता है कि अगर आंवले के पेड़ के नीचे भोजन पकाकर खाया जाये तो सारे रोग दूर हो जाते हैं। दिमागी मेहनत करने वाले व्यक्तियों को वर्षभर नियमित रूप से किसी भी विधि से आंवले का सेवन करना चाहिये। आंवले का नियमित सेवन करने से दिमाग में तरावट और शक्ति मिलती है।

आंवले के औषधीय उपयोग:-

1. आंवले का रस आंखों के लिए बहुत लाभकारी है। आंवला आंखों की ज्योति को बढ़ाता है। 

2. आंवला शारीरिक क्रियाशीलता को बढ़ाता है। यह भोजन को पचाने में बहुत सहायता करता है। भोजन में प्रतिदिन आंवले की चटनी, मुरब्बा, अचार, रस चूर्ण आदि को शामिल करना चाहिये। इससे कब्ज की शिकायत दूर होती है, पेट हल्का रहता है, रक्त की मात्रा में वृद्धि होती है।

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3. यह खून में शुगर की मात्रा को नियंत्रित करता है। 

4. महिलाओं की समस्याओं के लिए बेहद लाभकारी माना गया है। 

5. हड्डियों के लिए सर्वोत्तम औषधि है। आंवले के सेवन से हड्डियां मजबूत होती हैं।

6. आंवले के सेवन से तनाव में आराम मिलता है। नींद अच्छी आती है। आंवले का तेल सर को ठंडा रखता है। 

7. आंवले का सेवन करने से बाह्य बीमारियों से लड़ने की क्षमता विकसित होती है। 

8. यह संक्रमण से बचाव करता है। शरीर में फंगस आदि बीमारियों से बचाव करता है। आंवला शरीर को पुष्ट करता है।

9. मूत्र विकारों से छुटकारा दिलाता है। मूत्र विकारों में आंवले का चूर्ण फायदा करता है। आंवले का छाल और उसका सेवन करें तो लाभ होता है। 

10. आंवले के रस का सेवन करने से वजन कम करने में सहायता मिलती है। 

11. अगर किसी को नकसीर की समस्या है तो आंवले का सेवन लाभकारी है। 

12. आंवला हमारे हृदय की मांसपेशियों के लिये उत्तम होता है। यह नलिकाओं में होने वाली रूकावट को समाप्त करता है। 

13. यह उग्रता व उत्तेजना से शांति दिलाता है। अचानक से पसीना आना, गर्मी लगना, धातु के रोग, प्रमेय, प्रदर आदि चीजों में आराम दिलाता है। 

14. आंवले के रस से बवासीर ठीक हो जाता है।  

15. कुष्ठ रोग में भी आंवले का रस फायदेमंद होता है। 

16. आंवले का पाउडर और शहद का सेवन करें। आंवले के रस में मिश्री मिलाकर सेवन करने से उल्टियों का आना बंद हो जाता है। 

17. आंवले में ऐंटीओक्सिडेंट होते हैं जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। ये मौसम के कारण होने वाले वाइरल संक्रमण से भी बचाता है।

 

आंवले के विषय में जितना भी कहा जाये कम है। कहा जाता है कि यह 100 रोगों की एक दवा है। आयुर्वेद में आंवला सभी रोगों की अचूक दवा मानी गयी है। यह किसी भी रूप में बेहद लाभकारी है चाहे अचार हो या फिर मुरब्बा। शीत में आंवले का सेवन सभी को करना चाहिये। सुबह प्रतिदिन खाली पेट दो आंवले खाने या रात में सोने से ठीक पहले एक चम्मच आंवले का चूर्ण एक घूंट पानी के साथ लेने का प्रभाव आप एक महीने में स्वयं महसूस करेंगे।

 

Saturday, October 17, 2020

नागदोन के आयुर्वेदिक लाभ

लैटिन नाम: pedilanahus tithymaloi

हिंदी नाम: नागदोन, नागदमन, विषमार

संस्कृत नाम: नागदमनी

नागदोन का पौधा एवं परिचय, नागदौन की जानकारी:

  • नागदोन (नागदमनी) का पौधा जिसमें डालियाँ और टहनियाँ नहीं होती है |
  • इसके जड के ऊपर से ग्वारपाठे की सी पत्तियाँ चारों ओर निकलती हैं |
  • नागदमनी के पत्ते गहरे हरे रंग के, 3-4 इंच लंबाई वाले, तदनुसार चौड़ाई भी थोड़ी ही- ऊर्ध्वमुखी शाखाओं पर अल्प संख्या में ही होते हैं।
  • नागदमनी के कभी फूल या फल नहीं आते | इसकी डंडी या पत्ता तोड़ें तो दूध जैसे द्रव का स्राव होता है |
  • नागदौने की जड कंद के रूप में नीचे की ओर जाती है ।
  • कम जल और किसी भी वातावरण में जीवित रहने वाला नागदमनी के डंठल को तोड़-काट कर भी आसानी से लगाया जा सकता है|
  • वैद्यक में नागदौना चरपरा, कडुआ, हलका, त्रिदोषनाशक, कोठे को शुद्ध करनेवाला, विषनाशक तथा सूजन, प्रमेह और ज्वर को दूर करनेवाला माना जाता है ।
  • नागदोन (नागदमनी) के आयुर्वेदिक प्रयोग:-

मेधा-शक्ति-वर्धन:

मन्दबुद्धि बालकों को साधित नामदमनी मूल को भद्रादि रहित किसी रविवार या मंगलवार को ताबीज में भर कर लाल धागे में पिरोकर गले या बांह में बांध देने से अद्भुत लाभ होता है।सामान्य बालकों के बौद्धिक विकास हेतु भी यह प्रयोग किया जा सकता है।

बवासीर की समस्या में:-

 गुदा-नाल में वाहिकाओं की वे संरचनाएं हैं जो मल नियंत्रण में सहायता करती हैं।[1][2] जब वे सूज जाते हैं या बड़े हो जाते हैं तो वे रोगजनक या बवासीर[3] हो जाते हैं। अपनी शारीरिक अवस्था में वे धमनीय-शिरापरक वाहिका और संयोजी ऊतक द्वारा बने कुशन के रूप में काम करते हैं।

बवासीर दो प्रकार की होती है - खूनी बवासीर और बादी वाली बवासीर। खूनी बवासीर में मस्से खूनी सुर्ख होते है और उनसे खून गिरता है जबकि बादी वाली बवासीर में मस्से काले रंग के होते है और मस्सों में खाज पीडा और सूजन होती है। अतिसारसंग्रहणी और बवासीर यह एक दूसरे को पैदा करने वाले होते है।

प्रयोग 

नागदोन की एक से तीन पत्ती व एक से दो काली मिर्च को पीसकर रख ले |उसमें से एक चम्मच रस को सुबह खाली पेट पीने से बहुत ही लाभ होगा और अगर किसी व्यक्ति को अत्यधिक मात्रा में खून आता हो और वह बवासीर की वजह से बैठ भी नहीं पाता हो तो ऐसे व्यक्तियों के लिए ये उपाय बहुत ही उपयोगी है

 नोट- आप नागदोन के पत्ते को चबाकर भी खा सकते हैं और ऊपर से दो काली मिर्च का सेवन कर सकते हैं| इससे ब्लीडिंग की समस्या शीघ्र समाप्त हो जाती है |पत्ते अगर बड़े हैं ,तो केवल 1 पत्ते का सेवन करें और अगर पत्ते छोटे है तो 2 पत्ते का सेवन कर सकते हैं |

मासिक रक्तस्राव में लाभ:

मासिक रक्तस्राव अधिक हो तब भी यह प्रयोग किया जा सकता है| इसके तीन छोटे पत्ते काली मिर्च के साथ पांच दिन तक खा लें या फिर एक चम्मच रस सवेरे खाली पेट लें|जिन महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान अधिक मात्रा में रक्त स्राव होता है | उनके लिए नागदोन का पत्ता काफी लाभदायक हो सकता है|

 प्रयोग:- नागदोन के पत्ते को लेकर उसमे एक या दो काली मिर्च पीसकर उस का रस बनाकर सेवन करें | इससे जो अति रक्तस्राव की समस्या होती है | उसमें तत्काल लाभ होता है |

कब्ज़ में लाभ:

कब्ज होने का मतलब है मलत्याग में परेशानी होना या मल का सामान्य से कम आना। कब्ज एक ऐसी स्थिति होती है जिसमें व्यक्ति का पाचन तंत्र खराब हो जाता है, जिसके कारण वह जो भी खाना खाता है उसे पचा नहीं पाता है। यह आमतौर पर गंभीर नहीं है।

नागदमनी का चूर्ण खाने से लाभ होता है या उनका रस काली मिर्च के साथ खाली पेट लें |

फोड़े फुंसियों और सूजन में (nagdon ke patte ke fayde)- 

जिस व्यक्ति को कहीं भी सूजन हो या फोड़े या फुंसियां हो ,उनके लिए नागदोन का पत्ता बहुत ही उपयोगी है | नागदोन के पत्ते का प्रयोग सूजन, फोड़ा  या दर्द है ,उसमें बहुत ही आसानी से किया जा सकता है|

 प्रयोग

 नागदोन के पत्ते को थोड़ा गर्म करके उस पर दर्द निवारक तेल लगा कर उस स्थान पर बांधे ,जहां पर सूजन या फोड़ा है | इससे सूजन या दर्द में आराम मिलेगा | अगर सूजन है तो वह कम हो जाएगी और अगर फोड़ा है तो वह दब जाएगा |आप इसमें सरसों का तेल भी लगा कर बाँध सकते हैं।

नागदोन के नुकसान nagdon ke nukaan-

वैसे देखा जाए तो जितनी भी औषधीय गुणों वाले पौधे होते हैं  उनके फायदे अधिक होते हैं और नुकसान नाम मात्र के होते हैं |नागदोन भी अपने औषधि कोणों के लिए जाना जाता है और इन्हीं औषधि गुणों के कारण इसका प्रयोग अनेक बीमारियों में किया जाता है |लेकिन आपको इसका प्रयोग उतनी ही मात्रा में करना चाहिए जितनी मात्रा में आपको बताया जाता है | अगर आप इसका प्रयोग अत्यधिक मात्रा में करेंगे तो आपको इसका कुछ नुकसान भी देखने को मिल सकता है, लेकिन अभी तक इसका कोई नुकसान सामने देखने को नहीं मिला है|

नोट:-  आप किसी भी औषधि का प्रयोग बताए गए नियमों के अनुसार ही करें|वैसे भी किसी भी दवा को चिकित्सक की देखरेख में ही खाना उचित होता हैं।यहाँ पर बताये गए किसी भी उपाय को बिना चिकित्सक की परामर्श के न खाए।

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