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Friday, June 4, 2021

हमेशा अपने मन की सुनो।


 एक सहेली ने दूसरी सहेली से पूछा:- बच्चा पैदा होने की खुशी में तुम्हारे पति ने तुम्हें क्या तोहफा दिया ?


सहेली ने कहा - कुछ भी नहीं!


उसने सवाल करते हुए पूछा कि क्या ये अच्छी बात है ? 

क्या उस की नज़र में तुम्हारी कोई कीमत नहीं ?


लफ्ज़ों का ये ज़हरीला बम गिरा कर वह सहेली दूसरी सहेली को अपनी फिक्र में छोड़कर चलती बनी।।


थोड़ी देर बाद शाम के वक्त उसका पति घर आया और पत्नी का मुंह लटका हुआ पाया।। 

फिर दोनों में झगड़ा हुआ।।

एक दूसरे को लानतें भेजी।। 

मारपीट हुई, और आखिर पति पत्नी में तलाक हो गया।।


जानते हैं प्रॉब्लम की शुरुआत कहां से हुई ? उस फिजूल जुमले से जो उसका हालचाल जानने आई सहेली ने कहा था।।


रवि ने अपने जिगरी दोस्त आकाश से पूछा:- तुम कहां काम करते हो?

आकाश- फला दुकान में।। रवि- कितनी तनख्वाह देता है मालिक?

आकाश-18 हजार।।

रवि-18000 रुपये बस, तुम्हारी जिंदगी कैसे कटती है इतने पैसों में ?

आकाश- (गहरी सांस खींचते हुए)- बस यार क्या बताऊं।।


मीटिंग खत्म हुई, कुछ दिनों के बाद आकाश अब अपने काम से बेरूखा हो गया।। और तनख्वाह बढ़ाने की डिमांड कर दी।। जिसे मालिक ने रद्द कर दिया।। आकाश ने जॉब छोड़ दी और बेरोजगार हो गया।। पहले उसके पास काम था अब काम नहीं रहा।।


एक साहब ने एक शख्स से कहा जो अपने बेटे से अलग रहता था।। तुम्हारा बेटा तुमसे बहुत कम मिलने आता है।। क्या उसे तुमसे मोहब्बत नहीं रही? बाप ने कहा बेटा ज्यादा व्यस्त रहता है, उसका काम का शेड्यूल बहुत सख्त है।। उसके बीवी बच्चे हैं, उसे बहुत कम वक्त मिलता है।।


पहला आदमी बोला- वाह!! यह क्या बात हुई, तुमने उसे पाला-पोसा उसकी हर ख्वाहिश पूरी की, अब उसको बुढ़ापे में व्यस्तता की वजह से मिलने का वक्त नहीं मिलता है।। तो यह ना मिलने का बहाना है।।


इस बातचीत के बाद बाप के दिल में बेटे के प्रति शंका पैदा हो गई।। बेटा जब भी मिलने आता वो ये ही सोचता रहता कि उसके पास सबके लिए वक्त है सिवाय मेरे।।


याद रखिए जुबान से निकले शब्द दूसरे पर बड़ा गहरा असर डाल देते हैं।। बेशक कुछ लोगों की जुबानों से शैतानी बोल निकलते हैं।। हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में बहुत से सवाल हमें बहुत मासूम लगते हैं।।


जैसे-

तुमने यह क्यों नहीं खरीदा।।

तुम्हारे पास यह क्यों नहीं है।।

तुम इस शख्स के साथ पूरी जिंदगी कैसे चल सकती हो।।

Thursday, June 3, 2021

श्रम की महत्ता-अब्राहम लिंकन


 श्रम का महत्व


अब्राहम लिंकन गरीब वर्ग से आते थे उनके  पिता  जी जूते बनाते थे, जब वह राष्ट्रपति चुने गये तो अमेरिका के अभिजात्य वर्ग को बड़ी ठेस पहुँची!


सीनेट के समक्ष जब वह अपना पहला भाषण देने खड़े हुए तो एक सीनेटर ने ऊँची आवाज़ में कहा,मिस्टर लिंकन याद रखो कि तुम्हारे पिता मेरे और मेरे परिवार के जूते बनाया करते थे!इसी के साथ सीनेट भद्दे अट्टहास से गूँज उठी! लेकिन लिंकन किसी और ही मिट्टी के बने हुए थे! उन्होंने कहा कि, मुझे मालूम है कि मेरे पिता जूते बनाते थे! सिर्फ आप के ही नहीं यहाँ बैठे कई माननीयों के जूते उन्होंने बनाये होंगे! वह पूरे मनोयोग से जूते बनाते थे, उनके बनाये जूतों में उनकी आत्मा बसती है! अपने काम के प्रति पूर्ण समर्पण के कारण उनके बनाये जूतों में कभी कोई शिकायत नहीं आयी! क्या आपको उनके काम से कोई शिकायत है? उनका पुत्र होने के नाते मैं स्वयं भी जूते बना लेता हूँ और यदि आपको कोई शिकायत है तो मैं उनके बनाये जूतों की मरम्मत कर देता हूँ! मुझे अपने पिता और उनके काम पर गर्व है!


सीनेट में उनके ये तर्कवादी भाषण से सन्नाटा छा गया और इस भाषण को अमेरिकी सीनेट के इतिहास में बहुत बेहतरीन भाषण माना गया है और उसी भाषण से एक थ्योरी निकली Dignity of Labour (श्रम का महत्व) और इसका ये असर हुआ की जितने भी कामगार थे उन्होंने अपने पेशे को अपना सरनेम बना दिया जैसे कि - कोब्लर, शूमेंकर, बुचर, टेलर, स्मिथ, कारपेंटर, पॉटर आदि।


अमेरिका में आज भी श्रम को महत्व दिया जाता है इसीलिए वो दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति है।वहीं भारत में जो श्रम करता है उसका कोई सम्मान नहीं है वो छोटी जाति का है नीच है। यहाँ जो बिलकुल भी श्रम नहीं करता वो ऊंचा है।

  

जो यहाँ सफाई करता है, उसे हेय (नीच) समझते हैं और जो गंदगी करता है उसे ऊँचा समझते हैं।


ऐसी गलत मानसिकता के साथ हम दुनिया के नंबर एक देश बनने का सपना सिर्फ देख सकते है, लेकिन उसे पूरा नहीं कर सकते। जब तक कि हम श्रम को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखेंगे। जातिवाद और ऊँच नीच का भेदभाव किसी भी राष्ट्र निर्माण के लिए बहुत बड़ी बाधा है। यह एक सोचनीय विषय है और इसके हम सबको आगे आना होगा तभी हमारा देश व समाज का विकास होगा।


                     जय हिंद।


#warehouse mind.

Tuesday, June 1, 2021

असली शिक्षा।


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एक बड़ी सी गाड़ी आकर बाजार में रूकी, कार में ही मोबाईल से बातें करते हुयें, महिला ने अपनी बच्ची से कहा, जा उस बुढिया से पूछ सब्जी कैंसे दी, बच्ची कार से उतरतें ही,

अरें बुढिया यें सब्जी कैंसे दी?

40 रूपयें किलों, बेबी जी.....

सब्जी लेते ही, उस बच्ची ने सौ रूपयें का नोट उस सब्जी वाली को फेंक कर दिया, और आकर कार पर बैठ गयी, कार जाने लगी तभी अचानक किसी ने कार के सीसे पर दस्तक दी,

एक छोटी सी बच्ची जो हाथ में 60 रूपयें कार में बैठी उस औरत को देते हुये, बोलती हैं आंटी जी यें आपके सब्जी के बचें 60 रूपयें हैं, आपकी बेटी भूल आयी हैं,

कार में बैठी औरत ने कहा तुम रख लों, उस बच्ची बड़ी ही मिठी और सभ्यता से कहा, नही आंटी जी हमारें जितने पैंसे बनते थें हमने ले लियें हमें, हम इसे नही रख सकतें, मैं आपकी आभारी हूं, आप हमारी दुकान पर आए, आशा करती हूं, की सब्जी आपको अच्छी लगें, जिससे आप हमारें ही दुकान पर हमेशा आए, उस लड़की ने हाथ जोड़े और अपनी दुकान लौट गयी.......

कार में बैठी महिला उस लड़की से बहुत प्रभावित हुई और कार से उतर कर फिर सब्जी की दुकान पर जाने लगी, जैसें ही वहाँ पास गयी, सब्जी वाली अपनी बच्ची को पूछते हुयें, तुमने तमीज से बात की ना, कोई शिकायत का मौका तो नही दिया ना??

बच्ची ने कहा, हाँ माँ मुजे आपकी सिखाई हर बात याद हैं, कभी किसी बड़े का अपमान मत करो, उनसे सभ्यता से बात करो, उनकी कद्र करो, क्यूकि बड़े_बुजर्ग बड़े ही होते हैं, मुजे आपकी सारी बात याद हैं, और मैं सदैव इन बातों का स्मरण रखूगी,

बच्ची ने फिर कहा, अच्छा माँ अब मैं स्कूल चलती हूं, शाम में स्कूल से छुट्टी होते ही, दुकान पर आ जाऊंगी.......

कार वाली महिला शर्म से पानी पानी थी, क्यूकि एक सब्जी वाली अपनी बेटी को, इंसानियत और बड़ों से बात करने शिष्टाचार करने का पाठ सीखा रही थी और वो अपने अपनी बेटी को छोटा_बड़ा ऊंच_नीच का मन में बीज बो रही थी.....!!  

"गौर करना दोस्त,

सबसे  अच्छा तो वो कहलाता हैं, जो आसमान पर भी रहता हैं, और जमींन से भी जुड़ा रहता है।

"बस इंसानियत, भाईचारें, सभ्यता, आचरण, वाणी में मिठास, सब की इज्जत करने की सीख दीजिए अपने बच्चों को, क्यूकि अब बस यहीं पढ़ाई हैं जो आने वाले समय में बहुत ही जादा ही मुश्किल होगी, इसे पढ़ने इसे याद रखने इसे ग्रहण करने में, और जीवन को उपयोगी बनानें में..

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                              जय हिंद।

#warehouse mind.

Friday, May 28, 2021

लव मैरिज

 ट्रेन के ए.सी. कम्पार्टमेंट में मेरे सामने की सीट पर बैठी लड़की ने मुझसे पूछा " हैलो, क्या आपके पास इस मोबाइल की सिम निकालने की पिन है??" 

उसने अपने बैग से एक फोन निकाला, वह नया सिम कार्ड उसमें डालना चाहती थी। लेकिन सिम स्लॉट खोलने के लिए पिन की जरूरत पड़ती है, जो उसके पास नहीं थी। मैंने हाँ में गर्दन हिलाई और अपने क्रॉस बैग से पिन निकालकर लड़की को दे दी। लड़की ने थैंक्स कहते हुए पिन ले ली और सिम डालकर पिन मुझे वापिस कर दी।



थोड़ी देर बाद वो फिर से इधर उधर ताकने लगी, मुझसे रहा नहीं गया.. मैंने पूछ लिया "कोई परेशानी??"


वो बोली सिम स्टार्ट नहीं हो रही है, मैंने मोबाइल मांगा, उसने दिया। मैंने उसे कहा कि सिम अभी एक्टिवेट नहीं हुई है, थोड़ी देर में हो जाएगी। एक्टिव होने के बाद आईडी वेरिफिकेशन होगा, उसके बाद आप इसे इस्तेमाल कर सकेंगी।


लड़की ने पूछा, आईडी वेरिफिकेशन क्यों??


मैंने कहा " आजकल सिम वेरिफिकेशन के बाद एक्टिव होती है, जिस नाम से ये सिम उठाई गई है, उसका ब्यौरा पूछा जाएगा बता देना"

लड़की बुदबुदाई "ओह्ह "

मैंने दिलासा देते हुए कहा "इसमें कोई परेशानी की कोई बात नहीं"


वो अपने एक हाथ से दूसरा हाथ दबाती रही, मानो किसी परेशानी में हो। मैंने फिर विन्रमता से कहा "आपको कहीं कॉल करना हो तो मेरा मोबाइल इस्तेमाल कर लीजिए"


लड़की ने कहा "जी फिलहाल नहीं, थैंक्स, लेकिन ये सिम किस नाम से खरीदी गई है मुझे नहीं पता"

मैंने कहा "एक बार एक्टिव होने दीजिए, जिसने आपको सिम दी है उसी के नाम की होगी"

उसने कहा "ओके, कोशिश करते हैं" 

मैंने पूछा "आपका स्टेशन कहाँ है??"


लड़की ने कहा "दिल्ली"

और आप?? लड़की ने मुझसे पूछा


मैंने कहा "दिल्ली ही जा रहा हूँ, एक दिन का काम है,

आप दिल्ली में रहती हैं या...?"


लड़की बोली "नहीं नहीं, दिल्ली में कोई काम नहीं , ना ही मेरा घर है वहाँ"

तो ???? मैंने उत्सुकता वश पूछा


वो बोली "दरअसल ये दूसरी ट्रेन है, जिसमें आज मैं हूँ, और दिल्ली से तीसरी गाड़ी पकड़नी है, फिर हमेशा के लिए आज़ाद" 

आज़ाद?? 

लेकिन किस तरह की कैद से?? 

मुझे फिर जिज्ञासा हुई किस कैद में थी ये कमसिन अल्हड़ सी लड़की..


लड़की बोली, उसी कैद में थी, जिसमें हर लड़की होती है। जहाँ घरवाले कहे शादी कर लो, जब जैसा कहे, वैसा करो। मैं घर से भाग चुकी हूं..


मुझे ताज्जुब हुआ, मगर अपने ताज्जुब को छुपाते हुए मैंने हंसते हुए पूछा "अकेली भाग रही हैं आप? आपके साथ कोई नजर नहीं आ रहा? "


वो बोली "अकेली नहीं, साथ में है कोई"

कौन? मेरे प्रश्न खत्म नहीं हो रहे थे


दिल्ली से एक और ट्रेन पकड़ूँगी, फिर अगले स्टेशन पर वो जनाब मिलेंगे, और उसके बाद हम किसी को नहीं मिलेंगे..

ओह्ह, तो ये प्यार का मामला है। 

उसने कहा "जी"


मैंने उसे बताया कि 'मैंने भी लव मैरिज की है।'

ये बात सुनकर वो खुश हुई, बोली "वाओ, कैसे कब?" लव मैरिज की बात सुनकर वो मुझसे बात करने में रुचि लेने लगी


मैंने कहा "कब कैसे कहाँ? वो मैं बाद में बताऊंगा, पहले आप बताओ आपके घर में कौन कौन है?


उसने होशियारी बरतते हुए कहा " वो मैं आपको क्यों बताऊं? मेरे घर में कोई भी हो सकता है, मेरे पापा माँ भाई बहन, या हो सकता है भाई ना हो सिर्फ बहनें हो, या ये भी हो सकता है कि बहने ना हो और 2-4 गुस्सा करने वाले बड़े भाई हो"


मतलब मैं आपका नाम भी नहीं पूछ सकता "मैंने काउंटर मारा"

वो बोली, 'कुछ भी नाम हो सकता है मेरा, टीना, मीना, रीना, कुछ भी'


बहुत बातूनी लड़की थी वो.. थोड़ी इधर उधर की बातें करने के बाद उसने मुझे टॉफी दी जैसे छोटे बच्चे देते हैं क्लास में, 

बोली आज मेरा बर्थडे है।


मैंने उसकी हथेली से टॉफी उठाते बधाई दी और पूछा "कितने साल की हुई हो?"

वो बोली "18"


"मतलब भागकर शादी करने की कानूनी उम्र हो गई आपकी" 

वो "हंसी"


कुछ ही देर में काफी फ्रैंक हो चुके थे हम दोनों, जैसे बहुत पहले से जानते हो एक दूसरे को..


मैंने उसे बताया कि "मेरी उम्र 35 साल है, यानि 17 साल बड़ा हूं"


उसने चुटकी लेते हुए कहा "लग तो नहीं रहे हो"

मैं मुस्कुरा दिया

मैंने उससे पूछा "तुम घर से भागकर आई हो, तुम्हारे चेहरे पर चिंता के निशान जरा भी नहीं है, इतनी बेफिक्री मैंने पहली बार देखी"


खुद की तारीफ सूनकर वो खुश हुई, बोली "मुझे उन जनाब ने, मेरे लवर ने पहले से ही समझा दिया था कि जब घर से निकलो तो बिल्कुल बिंदास रहना, घरवालों के बारे में बिल्कुल मत सोचना, बिल्कुल अपना मूड खराब मत करना, सिर्फ मेरे और हम दोनों के बारे में सोचना और मैं वही कर रही हूँ"


मैंने फिर चुटकी ली, कहा "उसने तुम्हें मुझ जैसे अनजान मुसाफिरों से दूर रहने की सलाह नहीं दी?"

उसने हंसकर जवाब दिया "नहीं, शायद वो भूल गया होगा ये बताना"


मैंने उसके प्रेमी की तारीफ करते हुए कहा " वैसे तुम्हारा बॉय फ्रेंड काफी टैलेंटेड है, उसने किस तरह से तुम्हे अकेले घर से रवाना किया, नई सिम और मोबाइल दिया, तीन ट्रेन बदलवाई.. ताकि कोई ट्रेक ना कर सके, वेरी टैलेंटेड पर्सन"


लड़की ने हामी भरी, " बोली बहुत टैलेंटेड है वो, उसके जैसा कोई नहीं"

मैंने उसे बताया कि "मेरी शादी को 10 साल हुए हैं, एक बेटी है 8 साल की और एक बेटा 1 साल का, ये देखो उनकी तस्वीर"


मेरे फोन पर बच्चों की तस्वीर देखकर उसके मुंह से निकल गया "सो क्यूट"

मैंने उसे बताया कि "ये जब पैदा हुई, तब मैं कुवैत में था, एक पेट्रो कम्पनी में बहुत अच्छी जॉब थी मेरी, बहुत अच्छी सेलेरी थी.. फिर कुछ महीनों बाद मैंने वो जॉब छोड़ दी, और अपने ही कस्बे में काम करने लगा।" 

लड़की ने पूछा जॉब क्यों छोड़ी??


मैंने कहा "बच्ची को पहली बार गोद में उठाया तो ऐसा लगा जैसे मेरी दुनिया मेरे हाथों में है, 30 दिन की छुट्टी पर घर आया था, वापस जाना था, लेकिन जा ना सका। इधर बच्ची का बचपन खर्च होता रहे उधर मैं पूरी दुनिया कमा लूं, तब भी घाटे का सौदा है। मेरी दो टके की नौकरी, बचपन उसका लाखों का.."


उसने पूछा "क्या बीवी बच्चों को साथ नहीं ले जा सकते थे वहाँ?"


मैंने कहा "काफी टेक्निकल मामलों से गुजरकर एक लंबे समय के बाद रख सकते हैं, उस वक्त ये मुमकिन नहीं था.. मुझे दोनों में से एक को चुनना था, आलीशान रहन सहन के साथ नौकरी या परिवार.. मैंने परिवार चुना अपनी बेटी को बड़ा होते देखने के लिए। मैं कुवैत वापस गया था, लेकिन अपना इस्तीफा देकर लौट आया।"


लड़की ने कहा "वेरी इम्प्रेसिव" 

मैं मुस्कुराकर खिड़की की तरफ देखने लगा


लड़की ने पूछा "अच्छा आपने तो लव मैरिज की थी न, फिर आप भागकर कहाँ गए??

कैसे रहे और कैसे गुजरा वो वक्त??


उसके हर सवाल और हर बात में मुझे महसूस हो रहा था कि ये लड़की लकड़पन के शिखर पर है, बिल्कुल नासमझ और मासूम छोटी बहन सी। 

मैंने उसे बताया कि हमने भागकर शादी नहीं की, और ये भी है कि उसके पापा ने मुझे पहली नजर में सख्ती से रिजेक्ट कर दिया था।"


उन्होंने आपको रिजेक्ट क्यों किया?? लड़की ने पूछा


मैंने कहा "रिजेक्ट करने का कुछ भी कारण हो सकता है, मेरी जाति, मेरा काम,,घर परिवार,

"बिल्कुल सही", लड़की ने सहमति दर्ज कराई और आगे पूछा "फिर आपने क्या किया?"


मैंने कहा "मैंने कुछ नहीं किया,उसके पिता ने रिजेक्ट कर दिया वहीं से मैंने अपने बारे में अलग से सोचना शुरू कर दिया था। खुशबू ने मुझे कहा कि भाग चलते हैं, मेरी वाइफ का नाम खुशबू है..मैंने दो टूक मना कर दिया। वो दो दिन तक लगातार जोर देती रही, कि भाग चलते हैं। 

मैं मना करता रहा.. मैंने उसे समझाया कि "भागने वाले जोड़े में लड़के की इज़्ज़त पर पर कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता, जबकि लड़की के पूरे कुल की इज्ज़त धुल जाती है। भगाने वाला लड़का उसके दोस्तों में हीरो माना जाता है, लेकिन इसके विपरीत जो लड़की प्रेमी संग भाग रही है, वो कुल्टा कहलाती है, मुहल्ले के लड़के उसे चालू कहते है । बुराइयों के तमाम शब्दकोष लड़की के लिए इस्तेमाल किये जाते हैं। भागने वाली लड़की आगे चलकर 60 साल की वृद्धा भी हो जाएगी तब भी जवानी में किये उस कांड का कलंक उसके माथे पर से नहीं मिटता। 

मैं मानता हूँ कि लड़का लड़की को तौलने का ये दोहरा मापदंड गलत है, लेकिन हमारे समाज में है तो यही , ये नजरिया गलत है, मगर सामाजिक नजरिया यही है,


वो अपने नीचे का होंठ दांतों तले पीसने लगी, उसने पानी की बोतल का ढक्कन खोलकर एक घूंट पिया।


मैंने कहा अगर मैं उस दिन उसे भगा ले जाता तो उसकी माँ तो शायद कई दिनों तक पानी भी ना पीती, इसलिए मेरी हिम्मत ना हुई कि ऐसा काम करूँ.. मैं जिससे प्रेम करूँ, उसके माँ बाप मेरे माँ बाप के समान ही है, चाहे शादी ना हो, तो ना हो।


कुछ पल के लिए वो सोच में पड़ गई , लेकिन मेरे बारे में और अधिक जानना चाहती थी, उसने पूछा "फिर आपकी शादी कैसे हुई???

मैंने बताया कि " खुशबू की सगाई कहीं और कर दी गई थी। धीरे धीरे सबकुछ नॉर्मल होने लगा था। खुशबू और उसके मंगेतर की बातें भी होने लगी थी फोन पर, लेकिन जैसे जैसे शादी नजदीक आने लगी, उन लोगों की डिमांड बढ़ने लगी"


डिमांड मतलब 'लड़की ने पूछा'


डिमांड का एक ही मतलब होता है, दहेज की डिमांड। परिवार में सबको सोने से बने तोहफे दो, दूल्हे को लग्जरी कार चाहिए, सास और ननद को नेकलेस दो वगैरह वगैरह, बोले हमारे यहाँ रीत है। लड़का भी इस रीत की अदायगी का पक्षधर था। वो सगाई मैंने तुड़वा डाली..इसलिए नहीं की सिर्फ मेरी शादी उससे हो जाये, बल्कि ऐसे लालची लोगों में खुशबू कभी खुश नहीं रह सकती थी । ना उसका परिवार, फिर किसी तरह घरवालों को समझा बुझा कर मैं फ्रंट पर आ गया और हमारी शादी हो गई। ये सब किस्मत की बात थी.. 

लड़की बोली "चलो अच्छा हुआ आप मिल गए, वरना वो गलत लोगों में फंस जाती"


मैंने कहा "जरूरी नहीं कि माता पिता का फैसला हमेशा सही हो, और ये भी जरूरी नहीं कि प्रेमी जोड़े की पसन्द सही हो.. दोनों में से कोई भी गलत या सही हो सकता है..काम की बात यहाँ ये है कि कौन ज्यादा वफादार है।"


लड़की ने फिर से पानी का घूंट लिया और मैंने भी.. लड़की ने तर्क दिया कि "हमारा फैसला गलत हो जाए तो कोई बात नहीं, उन्हें ग्लानि नहीं होनी चाहिए"


मैंने कहा "फैसला ऐसा हो जो दोनों का हो, बच्चों और माता पिता दोनों की सहमति, वो सबसे सही है। बुरा मत मानना मैं कहना चाहूंगा कि तुम्हारा फैसला तुम दोनों का है, जिसमे तुम्हारे पेरेंट्स शामिल नहीं है, ना ही तुम्हें इश्क का असली मतलब पता है अभी"


उसने पूछा "क्या है इश्क़ का सही अर्थ?"


मैंने कहा "तुम इश्क में हो, तुम अपना सबकुछ छोड़कर चली आई ये सच्चा इश्क़ है, तुमने दिमाग पर जोर नहीं दिया ये इश्क है, फायदा नुकसान नहीं सोचा ये इश्क है...तुम्हारा दिमाग़ दुनियादारी के फितूर से बिल्कुल खाली था, उस खाली जगह में इश्क का फितूर भर दिया गया। जिन जनाब ने इश्क को भरा क्या वो इश्क में नहीं है.. यानि तुम जिसके साथ जा रही हो वो इश्क में नहीं, बल्कि होशियारी हीरोगिरी में है। जो इश्क में होता है वो इतनी प्लानिंग नहीं कर पाता है, तीन ट्रेनें नहीं बदलवा पाता है, उसका दिमाग इतना काम ही नहीं कर पाता.. कोई कहे मैं आशिक हुँ, और वो शातिर भी हो ये नामुमकिन है।मजनूं इश्क में पागल हो गया था, लोग पत्थर मारते थे उसे, इश्क में उसकी पहचान तक मिट गई। उसे दुनिया मजनूं के नाम से जानती है, जबकि उसका असली नाम कैस था, जो नहीं इस्तेमाल किया जाता। वो शातिर होता तो कैस से मजनूं ना बन पाता। फरहाद ने शीरीं के लिए पहाड़ों को खोदकर नहर निकाल डाली थी और उसी नहर में उसका लहू बहा था, वो इश्क़ था। इश्क़ में कोई फकीर हो गया, कोई जोगी हो गया, किसी मांझी ने पहाड़ तोड़कर रास्ता निकाल लिया..किसी ने अतिरिक्त दिमाग़ नहीं लगाया..चालाकी नहीं की ।

लालच ,हवस और हासिल करने का नाम इश्क़ नहीं है.. इश्क समर्पण करने को कहते हैं, जिसमें इंसान सबसे पहले खुद का समर्पण करता है, जैसे तुमने किया, लेकिन तुम्हारा समर्पण हासिल करने के लिए था, यानि तुम्हारे इश्क में लालच की मिलावट हो गई


लकड़ी अचानक खो सी गई.. उसकी खिलख़िलाहट और खिलंदड़ापन एकदम से खमोशी में बदल गया.. मुझे लगा मैं कुछ ज्यादा बोल गया, फिर भी मैंने जारी रखा, मैंने कहा " प्यार तुम्हारे पापा तुमसे करते हैं, कुछ दिनों बाद उनका वजन आधा हो जाएगा, तुम्हारी माँ कई दिनों तक खाना नहीं खाएगी ना पानी पियेगी.. जबकि आपको अपने आशिक को आजमा कर देख लेना था, ना तो उसकी सेहत पर फर्क पड़ता, ना दिमाग़ पर, वो अक्लमंद है, अपने लिए अच्छा सोच लेता।

आजकल गली मोहल्ले के हर तीसरे लौंडे लपाटे को जो इश्क हो जाता है, वो इश्क नहीं है, वो सिनेमा जैसा कुछ है। एक तरह की स्टंटबाजी, डेरिंग, अलग कुछ करने का फितूर..और कुछ नहीं।


लड़की का चेहरे का रंग बदल गया, ऐसा लग रहा था वो अब यहाँ नहीं है, उसका दिमाग़ किसी अतीत में टहलने निकल गया है। मैं अपने फोन को स्क्रॉल करने लगा.. लेकिन मन की इंद्री उसकी तरफ थी।


थोड़ी ही देर में उसका और मेरा स्टेशन आ गया.. बात कहाँ से निकली थी और कहाँ पहुँच गई.. उसके मोबाइल पर मैसेज टोन बजी, देखा, सिम एक्टिवेट हो चुकी थी.. उसने चुपचाप बैग में से आगे का टिकट निकाला और फाड़ दिया.. मुझे कहा एक कॉल करना है, मैंने मोबाइल दिया.. उसने नम्बर डायल करके कहा "सोरी पापा, और सिसक सिसक कर रोने लगी, सामने से पिता भी फोन पर बेटी को संभालने की कोशिश करने लगे.. उसने कहा पिताजी आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए मैं घर आ रही हूँ..दोनों तरफ से भावनाओं का सागर उमड़ पड़ा"


हम ट्रेन से उतरे, उसने फिर से पिन मांगी, मैंने पिन दी.. उसने मोबाइल से सिम निकालकर तोड़ दी और पिन मुझे वापस कर दिया


कहानी को अंत तक पढ़ने का धन्यवाद।

देश की सभी बेटियों को समर्पित- 

ये मेरा दावा है माता पिता से ज्यादा तुम्हें दुनिया मे कोई प्यार नहीं करता। 

कहानी पढ़कर, शेयर अवश्य कीजिएगा, शायद कोई परिवार, कोई बेटी और उनका भविष्य इससे बच जाए 🙏


साभार

#Warehouse mind

स्नेह के आंसू

 गली से गुजरते हुए सब्जी वाले ने तीसरी मंजिल  की घंटी  का बटन दबाया।  ऊपर से बालकनी का दरवाजा खोलकर बाहर आई महिला ने नीचे देखा। 


"बीबी जी !  सब्जी ले लो ।  बताओ क्या- क्या तोलना है।  कई दिनों से आपने सब्जी नहीं खरीदी मुझसे, कोई और देकर जा रहा है?" 

सब्जी वाले ने चिल्लाकर कहा। 


"रुको भैया!  मैं नीचे आती हूँ।"


उसके बाद महिला घर से नीचे उतर कर आई  और सब्जी वाले के पास आकर बोली - 

"भैया ! तुम हमारी घंटी मत बजाया करो। हमें सब्जी की जरूरत नहीं है।"


"कैसी बात कर रही हैं बीबी जी ! सब्जी खाना तो सेहत के लिए बहुत जरूरी होता है। किसी और से लेती हो क्या सब्जी ?" 

सब्जीवाले ने कहा। 


"नहीं भैया!  उनके पास अब कोई काम नहीं है। और किसी  तरह से हम लोग अपने आप को जिंदा रखे हुए हैं।  जब सब  ठीक होने लग जाएगा, घर में कुछ पैसे आएंगे,  तो तुमसे ही सब्जी लिया करूंगी।  मैं किसी और से सब्जी  नहीं खरीदती हूँ। तुम घंटी बजाते हो तो उन्हें बहुत बुरा लगता है,  उन्हें अपनी मजबूरी पर गुस्सा आने लगता है।  इसलिए भैया अब तुम हमारी घंटी मत बजाया करो।" 

महिला कहकर अपने घर में वापिस जाने लगी। 


"ओ बहन जी !  तनिक रुक जाओ। हम इतने बरस से  तुमको सब्जी दे रहे हैं । जब तुम्हारे अच्छे दिन थे,  तब तुमने हमसे खूब सब्जी और फल लिए थे।  अब अगर थोड़ी-सी परेशानी आ गई है, तो क्या हम तुमको ऐसे ही छोड़ देंगे ? सब्जी वाले हैं, कोई नेता जी तो है नहीं  कि वादा करके छोड़ दें।  रुके रहो दो मिनिट।" 


और सब्जी वाले ने  एक थैली के अंदर टमाटर , आलू, प्याज, घीया, कद्दू और करेले डालने के बाद धनिया और मिर्च भी उसमें डाल दिया । महिला हैरान थी। उसने तुरंत कहा – 


"भैया !  तुम मुझे उधार  सब्जी दे रहे हो,  कम से कम तोल तो लेते,  और मुझे पैसे भी बता दो।  मैं तुम्हारा हिसाब लिख लूंगी।  जब सब ठीक हो जाएगा तो तुम्हें तुम्हारे पैसे वापस कर दूंगी।" महिला ने कहा। 


"वाह..... ये क्या बात हुई भला ? तोला तो इसलिए नहीं है कि कोई मामा अपने भांजी -भाँजे से पैसे नहीं लेता है। और बहिन ! मैं  कोई अहसान भी नहीं कर रहा हूँ ।  ये सब  तो यहीं से कमाया है,  इसमें तुम्हारा हिस्सा भी है। गुड़िया के लिए ये आम रख रहा हूँ, और भाँजे के लिए मौसमी । बच्चों का खूब ख्याल  रखना। ये बीमारी बहुत बुरी है। और आखिरी बात सुन लो .... घंटी तो मैं जब भी आऊँगा, जरूर बजाऊँगा।" 

और सब्जी वाले ने मुस्कुराते हुए दोनों थैलियाँ महिला के हाथ में थमा दीं। 


अब महिला की आँखें मजबूरी की जगह स्नेह के आंसुओं से भरी हुईं थीं। 

                             जय हिंद।


#warehouse mind

Thursday, May 27, 2021

पैसों का बाज़ारीकरण।

 

किसी ने सच कहा है कि जब तक दुनिया में मुर्ख लोग हैं, होशियार लोग कभी भूखे नहीं मरेगें .........


खुद ही देख लीजिये


टॉयलेट धोने का हार्पिक अलग,बाथरूम धोने का अलग,

टॉयलेट की बदबू दूर करने के लिए खुशबु छोड़ने वाली टिकिया भी जरुरी है,


कपडे हाथ से धो रहे हो तो अलग वाशिंग पाउडर,

और मशीन से धो रहे हो तो खास तरह का पाउडर, 

नहीं तो तुम्हारी 20,000 की मशीन एक बाल्टी से ज्यादा कुछ नहीं,और हाँ कॉलर का मैल हटाने का वेनिश तो घर में होगा ही,


हाथ धोने के लिए नहाने वाला साबुन तो दूर की बात, 

एंटीसेप्टिक सोप भी काम में नहीं ले सकते,

लिक्विड ही यूज करो, साबुन से कीटाणु ट्रांसफर होते है(ये तो वो ही बात हो गई कि कीड़े मारनेवाली दवा में कीड़े पड़ गए),


बाल धोने के लिए शैम्पू ही पर्याप्त नहीं , कंडीशनर भी जरुरी है,फिर बॉडी लोशन,फेस वाश, डियोड्रेंट, हेयर जेल,सनस्क्रीन क्रीम,स्क्रब,गोरा बनाने वाली क्रीम काम में लेना अनिवार्य है ही..


और हाँ दूध ( जो खुद शक्तिवर्धक है) की शक्ति बढाने के लिए हॉर्लिक्स मिलाना तो भूले नहीं न आप...मुन्ने का हॉर्लिक्स अलग, मुन्ने की मम्मी का अलग,और मुन्ने के पापा का अलग,


साँस की बदबू दूर करने के लिये ब्रश करना ही पर्याप्त नहीं,

माउथ वाश से कुल्ले करना भी जरुरी है,अरे ये क्या आपका टीवी अभी भी वही पुराना स्टाइल यानी डिब्बा, 

अब तो 36 इंच का LCD तो लेना बनता ही है...


आज से मात्र कुछ वर्षों पहले तक ना तो किसी के घर में टीवी था ना वाशिंग मशीन, ना फ्रिज था ना AC और ना ही RO , और अब तो हवा साफ करने के लिए एयर प्यूरीफायर आ गए हैं वो तो लिया ही नहीं ।


ये मात्र कुछ चीजों के उदाहरण दिए हैं, ऐसे ही और क्या क्या आप फालतू का इस्तेमाल कर रहे हैं आप खुद ही सोच लीजिये......


तो श्रीमान मुस्सदीलाल जी,

15-20 साल पहले जिस घर का खर्च 10 हज़ार में आसानी से चल जाता था आज उसी का बजट 40 हजार को पार कर गया है तो उसमें सारा दोष महंगाई का ही नहीं है, तो कांग्रेस, या बीजेपी या मोदी जी को गाली देने से पहले थोडा इधर भी सोचो....


मजे की बात जो हरामखोर सेलेब्रेटी करोड़ो करोड़ो रूपये लेकर इन चीजों का टीवी पर प्रचार करते हैं वो खुद इन्हें कभी ईस्तेमाल नहीं करते ।


असल में हम लोग इन कंपनियों के लिए एक पैसा बनाने की मशीन बन गए हैं । इन चीजों की हमे कोई ज़रूरत नहीं होती है केवल इन कंपनियों की बेचने की चालों के चलते हम पागलों की तरह खर्चे बढ़ा रहे हैं और फिर गधे की तरह कमाने में लग रहे हैं।


घर मे एक आदमी की कमाई से अब काम नहीं चलता, इस लिए बीवी भी काम करेगी और बच्चे आया पालेगी । बच्चे थोड़े से बड़े हो गए तो वो भी काम पर लग गए । क्या यह पागलपन नहीं है ? क्यों जी रहे हैं आप, अपने लिए या इन कंपनियों के लिए ?


सोचिए और अपनी इन बेफजूल की खरीदारी को बंद कीजिए, और नहीं कर सकते तो ऐसे ही लगे रहिये सिर नीचे करके गधों की तरह पैसे कमाने में क्योंकि सामानों की लिस्ट बहुत लंबी है

 । जय हिंद

#warehouse mind

दान :- मदद या दिखावा

 #यूरोप का एक देश है नार्वे .... 

वहां कभी जाईयेगा तो 

यह सीन आम तौर पर पाईयेगा.... 


एक रेस्तरां है ...

उसके कैश काउंटर पर एक महिला आती है 

और कहती है - 

"5 Coffee, 1 Suspension"..

फिर वह पांच कॉफी के पैसे देती है 

और चार कप कॉफी ले जाती है ...


थोड़ी देर बाद ...

एक और आदमी आता है ,कहता है- 

"4 Lnch, 2 Suspension" !!! 

वह चार Lunch का भुगतान करता है 

और दो Lunch packets ले जाता है...


फिर एक और आता है ...

आर्डरदेता है -  

"10 Coffee,  6 Suspension" !!!

वह दस के लिए भुगतान करता है,

चार कॉफी ले जाता है...


थोड़ी देर बाद.... 

एक बूढ़ा आदमी जर्जर कपड़ों में  

काउंटर पर आकर पूछता है-  

"Any Suspended Coffee ??" 

काउंटर-गर्ल मौजूद कहती है- 

"Yes !!"

और एक कप गर्म कॉफी उसको दे देती है ...


कुछ देर बाद वैसे ही 

एक और दाढ़ी वाला आदमी अंदर आता है,

पूछता है- 

"Any Suspended Lunch ??" 

तो काउंटर पर मौजूद व्यक्ति 

गर्म खाने का एक पार्सल और 

पानी की एक बोतल उसको दे देता है ...


और यह क्रम ...

एक ग्रुप द्वारा अधिक पेमेंट करने का 

और 

दूसरे ग्रुप द्वारा बिना पेमेंट खान-पान ले जाने का 

दिन भर चलता रहता है .... 


यानि ...

अपनी "पहचान" न कराते हुए 

और 

किसी के चेहरे को "जाने बिना" भी 

अज्ञात गरीबों, जरुरतमन्दों की मदद करना...

यह है नार्वे नागरिकों की परंपरा !!!


और बताया गया कि 

यह "कल्चर" अब यूरोप के अन्य कई देशों में 

फैल रही है...


और एक हम हैं ...!!!

जो अस्पतालों में एक केला,एक संतरा 

मरीजों को बांटेंगे...

सारे मिलकर अपनी पार्टी, अपने संगठन का 

ग्रुप फोटो खिंचाकर 

अखबार में छापेंगे !!!  

है ना ???


क्या भारत में भी ...

इस प्रकार की  खान-पान की 

"Suspension" जैसी प्रथा का 

प्रारंभ हो सकता है ???


और हमारे यहां के दानीयों की कहानी,

 बयान नीचे यह तस्वीर कर रही है।👇



#warehouse mind

गर्भपात:-एक गूँगी चीख

 


गर्भपात करवाना गलत माना गया है, गर्भपात करने वाला और करवाने वाले दोनों ही बराबर सजा के हकदार हैं क्योंकि यह एक कानूनी अपराध है ।कृपया इस लेख को अवश्य पढ़े और अगर इसे पढ़ कर आपके दिल की धड़कने बढ़ जाये तो शेयर अवश्य करे |

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अमेरिका में सन 1984 में एक सम्मेलन हुआ था - 'नेशनल राइट्सटू लाईफकन्वैन्शन'।

इस सम्मेलन के एक प्रतिनिधि ने डॉ॰ बर्नार्ड नेथेनसन के द्वारा गर्भपात की बनायी गयी एक अल्ट्रासाउण्ड फिल्म 'साइलेण्ट स्क्रीम' (गूँगी चीख) का जो विवरण दिया था, वह इस प्रकार है-

'गर्भ की वह मासूम बच्ची अभी 15 सप्ताह की थी व काफी चुस्त थी।

हम उसे अपनी माँ की कोख मेँ खेलते, करवट बदलते व अंगूठा चूसते हुए देख रहे थे। उसके दिल की धड़कनों को भी हम देख पा रहे थे और वह उस समय 120 की साधारण गति से धड़क रहा था। सब कुछ बिलकुल सामान्य था; किन्तु जैसे ही पहले औजार (सक्सन पम्प) ने गर्भाशय की दीवार को छुआ, वह मासूम बच्ची डर से एकदम घूमकर सिकुड़ गयी और उसके दिल की धड़कन काफी बढ़गयी।

हालांकि अभी तक किसी औजार ने बच्ची को छुआ तक भी नहीं था, लेकिन उसे अनुभव हो गया था कि कोई चीज उसके आरामगाह,उसके सुरक्षित क्षेत्र पर हमला करने का प्रयत्न कररही है।

हम दहशत से भरे यह देख रहे थे कि किस तरह वह औजार उस नन्हीं-मुन्नी मासूम गुड़िया- सी बच्ची के टुकड़े-टुकड़े कर रहा था।

पहले कमर,फिर पैर आदि के टुकड़े ऐसे काटे जा रहे थे जैसे वह जीवित प्राणी न होकर कोई गाजर-मूली हो और वह बच्ची दर्द से छटपटाती हुई, सिकुड़कर घूम-घूमकर

तड़पती हुई इस हत्यारे औजार से बचने का प्रयत्न कर रही थी।

वह इस बुरी तरह डर गयी थी कि एक समय उसके दिल की धड़कन 200 तक पहुँच गयी! मैँने स्वंय अपनी आँखों से उसको अपना सिर पीछे झटकते व मुँह खोलकर चीखने का प्रयत्न करते हुए देखा, जिसे डॉ॰ नेथेनसन ने उचित ही 'गूँगी चीख' या 'मूक पुकार' कहा है।

अंत मेँ हमने वह नृशंस वीभत्स दृश्य भी देखा, जब सँडसी उसकी खोपड़ी को तोड़ने

के लिए तलाश रही थी और फिर दबाकर उस कठोर खोपड़ी को तोड़ रही थी

क्योँकि सिर का वह भाग बगैर तोड़े सक्शन ट्यूब के माध्यम से बाहर नहीं निकाला जा सकता था।' हत्या के इस वीभत्स खेल को सम्पन्न करने में करीब पन्द्रह मिनट का समय लगा

और इसके दर्दनाक दृश्य का अनुमान इससे अधिक और कैसेलगाया जा सकता है कि जिस डॉक्टर ने यह गर्भपात किया था और जिसने मात्र कौतूहलवश इसकी फिल्म बनवा ली थी,

उसने जब स्वयं इस फिल्म को देखा तो वह अपना क्लीनिक छोड़कर चला गया और फिर वापस नहीं आया ! —

आपका एक शेयर किसी अजन्मी बच्ची -लडकी की जान बचा सकता है!

"Save Girls "👍✍ 

                         जय हिंद

#warehouse mind

Tuesday, May 25, 2021

न आना इस देश लाडो :-कन्या भ्रूण हत्या।

रात के लगभग 8 बजे थे । प्राइवेट नर्सिंग होम में एक महिला को इमरजेंसी में भर्ती कराया गया और उसका अल्ट्रासाउंड हो रहा था । औरत लगातार दर्द से रो रही थी और बीच बीच में अंग्रेजी में डॉक्टर से कुछ-कुछ पूछ रही थी । डॉक्टर ने कान में आला लगा कर बच्चे की धड़कन सुनने की कोशिश की । तभी भ्रूण ने चिल्ला कर कहा ''डॉक्टर, मुझे मार डालो, मैं इस दुनिया में नहीं आना चाहती, मेरी ह्त्या कर दो ।'' डॉक्टर ने कहा ''ऐसा क्यों कह रही हो अब तो तुम 3 महीने की हो चुकी हो'', अब ये सब मुमकिन नहीं और ऐसा क्यों करूँ मैं?'' भ्रूण ने बेहद कातर स्वर में कहा ''डॉक्टर, आप नहीं जानती मेरी माँ की स्थिति, मुझे बचाने के लिए वो कितनी पीड़ा सह रही है, जबकि वो तो जानती भी नहीं थी कि मैं कन्या भ्रूण हूँ ।'' डॉक्टर भी हत्प्रभ! क्योंकि वो औरत न तो गरीब परिवार की दिख रही न अशिक्षित, धड़ाधड़ अंग्रेजी में मेडिकल टर्म के शब्द बोल रही थी और किसी तरह बच्चे को बचा लेने के लिए अनुरोध कर रही थी । डॉक्टर समझ नहीं पा रही थी कि एक शिक्षित संपन्न माँ की कन्या-भ्रूण क्यों दुनिया में आना नहीं चाहती है? . भ्रूण ने बताया कि जब उसकी माँ को पहली बार ये पता चला कि वो पेट से है तो खुश होकर अपने पति को बताने गई । दो झन्नाटेदार चांटा गाल पर । माँ सहम गई । उसका पति चिल्लाने लगा कि बच्चा पैदा करने किसने बोला, उसने बच्चा पैदा करने के लिए शादी नहीं की है । उसे रोज उसका बदन चाहिए न कि बच्चा । बहुत रोई माँ । दूसरे दिन जब ऑफिस गई तो सभी ने पूछा अरे फिर से ये क्या हो गया तुमको, गाल पर चोट के निशान । माँ ने बताया कि वो फिर से बाथरूम में फिसल गई, बहुत स्लीपरी है न बाथरूम । कई बार चोट के नीले निशान तथा हाथ और चेहरे पर खरोंच भी देखा था सभी ने, पर हर बार माँ यही कहती कि कभी सीढ़ी से गिर गई तो कभी रास्ते पर हड़बड़ी में चलते हुए गिर गई तो कभी पड़ोस के शिशु ने नाखून से नोच दिया । वो कैसे कहती कि उसका पति जिससे उसने प्रेम विवाह किया है हर रात उसमें शैतान उतर आता है । . दूसरे दिन शाम को माँ के ऑफिस से लौटने के बाद उसका पति उसे डॉक्टर के पास ले गया और लिंग जाँच कराया तो पता चला कि कन्या है । रात को उसके पति ने जबरन शराब पिलाई और उसमें नींद की 8-10 गोलियाँ डाल दी । रात में तवियत बिगड़ने पर किसी डॉक्टर के पास ले गया और हमल गिरवा दिया । सुबह जब उसकी नींद खुली वो समझ गई कि उसका बच्चा नहीं रहा । फिर वही नियम, घर का काम काज फिर ऑफिस और फिर वही रात जिसमें उसे खरीदी हुई वेश्या बन जाना होता है, जिसका फ़र्ज़ ग्राहक जैसा चाहे उसे खुश करना है । . इस बार जब गर्भ रह गया तो माँ ने किसी को नहीं बताया । किसी तरह 3 महीना गुजर गया । जिसमें से एक महीना वो अपने सास ससुर के पास रही क्योंकि सास अस्वस्थ थी, और अच्छी परिचारिका होने के कारण पति ने उसे वहाँ भेज दिया था । सास को पता चल गया कि वो पेट से है । खुशी में खूब लड्डू बांटे और पोता ही जनने की धमकी दे डाली । बेटे को बताया तो बेटा खुश हुआ और पत्नी को उलाहना दिया कि तुमने मुझे क्यों नहीं बताया । माँ सोची कि शायद इस बार सब ठीक हो गया है । सास भी वारिस का मुँह देखने साथ ही यहाँ आ गई थी । आज शाम को पति बोला कि चलो डॉक्टर को दिखा लो और जो भी सावधानी चाहिए वो पता कर लो । माँ चली गई डॉक्टर के पास । फिर उसके पति ने डॉक्टर से पता कर लिया कि गर्भ में इस बार भी कन्या है । घर आकर माँ को बहुत मारा और पेट के बल धक्का दे दिया । सास खड़ी होकर तमाशा देखती रही । तभी उसके पति का एक दोस्त घर आया, उसने देखा कि माँ नीचे पड़ी कराह रही है और रक्त बह रहा है । दोस्त को देखते ही उसका पति बोला कि माँ सीढ़ी से गिर गई है और फिर झट से माँ को उठाया और गाड़ी में लेकर यहाँ आया । . भ्रूण ने कहा ''मैं कन्या हूँ न, तो इतने से मार से मैं खत्म नहीं हो पाई, दोस्त अंकल के कारण मैं बच गई । लेकिन दूसरे के भरोसे कितने दिन मैं बचूंगी, और बच भी गई तो माँ तो रोज ऐसे ही पिटेगी, नहीं सह पाती हूँ ये सब देख कर ।'' डॉक्टर ने भ्रूण को बहुत समझाया कि 3 महीने की तुम हो चुकी हो और ऐसा करना पाप है और अपराध भी । भ्रूण ने कहा कि आप नहीं कर सकती पर दूसरे डॉक्टर तो यह करते ही हैं । किसी डॉक्टर ने ही तो बताया था कि माँ के पेट में कन्या है और तभी तो माँ के साथ इतना क्रूर बर्ताव हुआ है । माँ को जब उसका पति मार रहा था तो बोला ''अगर पैदा ही करना है तो लड़का पैदा करो, मेरा वंश तो चलेगा । लड़की की रखवाली हर वक्त कौन करेगा, कहीं रेप वेप हो गया तो किसको मुँह दिखाएँगे, लड़की पैदा करके क्या दहेज में अपनी सब संपत्ति किसी गैर को दे दूँ?'' . ''डॉक्टर, आप ही बताइए क्या ऐसे घर में मेरा जन्म लेना मुनासिब है? अगर इन सब के बाद बच गई तो जन्म के बाद जाने क्या हो? जाने कब कौन हवस का शिकार बना ले । हर वक्त बदन के अंदर झांकती नज़रों से कहाँ बच पाऊँगी । इन सबसे गुजरते हुए बड़े होने पर अगर कोई मन को भा जाए तो क्या पता कि मुझे इसकी क्या सजा मिले, मुमकिन है हम दोनों को मौत के घाट उतार दिया जाए । ये भी संभव है कि किसी के इसरार पर इनकार करूँ तो तेज़ाब से जला कर मुझे सदा के लिए विकृत कर दे । अगर इन सब हादसों से बच जाऊँ और विवाह की बात हो तो दहेज की जुगाड़ में माँ बाप के अवसाद की वजह बनूँगी और फिर मेरा मन भी कुंठाग्रस्त हो जाएगा । अगर ये भी सही सलामत निपट जाए तो क्या मालूम और-और दहेज के लिए जला दी जाऊँ या फिर चरित्रहीन बताकर निष्काषित कर दी जाऊँ या फिर मुझे आत्महत्या करने के लिए विवश होना पड़े । ये भी मुमकिन है कि किसी की धूर्तता से मैं भी माँ-सी बन जाऊँ, जिसे इस आरोप में बार बार प्रताड़ित किया जाए कि पेट से क्यों हुई या फिर पेट में कन्या भ्रूण क्यों?'' . ''डॉक्टर, मुझे नहीं जीना ऐसी दुनिया में, मुझे नहीं बनाना अपनी माँ की तरह और न चाहती हूँ ऐसी खौफनाक जिंदगी जिसमें हर पल अपने अस्तित्व को बचाने के लिए वार और आघात सहूँ । लोगों के तिरस्कार और घृणा की पात्र बनूँ । भ्रूण से लेकर जन्म होने और उसके बाद मृत्यु तक तमाम उम्र खौफ के साये में जियूँ । अपने जीवन के वास्ते दूसरों की मेहरबानी के लिए याचना करती रहूँ और एक-एक दिन ये सोचकर व्यतीत करूँ कि चलो आज तो सुरक्षित रही । जानती हूँ मुझे मार ही दिया जाना है, चाहे तुम मारो या दुसरी डॉक्टर । माँ के साथ मैं भी हर वक्त डरी होती हूँ कि कब क़त्ल कर दी जाऊँ । पल-पल मृत्यु की प्रतीक्षा बहुत खौफ़नाक होती है । मैं नहीं आना चाहती ऐसे घृणित और डरावने संसार में ।'' . ''डॉक्टर, तुम ही सोचो दुर्गा लक्ष्मी सरस्वती को पूजने वाले भी अपने लिए कन्या नहीं चाहते । ये माना जाता है कि बिना ईश्वर-कृपा कुछ नहीं होता, फिर तो ईश्वर की इच्छा से ही कन्या भ्रूण भी माँ के गर्भ में आती है न । पर अब लगता है कि शायद ईश्वर के हाथ में जीवन मृत्यु नहीं, डॉक्टर चाहे तो परखनली द्वारा भ्रूण को जन्म दे दे और जब चाहे किसी को मृत्यु । मैं जन्म नहीं लेना चाहती डॉक्टर, मुझे मार दो ।'' . जिस डॉक्टर ने पाप-पुण्य और कानून की बात सुनाकर क़त्ल करने से मना कर दिया था उसी ने पैसे से पाप को पुण्य में बदल दिया । डॉक्टर ने कसाई का रूप धारण किया और माँ के बदन से भ्रूण को निकाल दिया । एक चीख और फिर निःस्तब्धता । मानवता फिर से हारी और पुरुष जीत गया ।😥 जबकि आज के समय मे बेटा बेटी एक समान है अगर उन्हें समाज मे एक समान अवसर मिले तो "म्हारी छोरियां छोरो से कम ह के।" हमारे देश मे आज के समय भ्रूण हत्या कानूनी अपराध ह लेकिन फिर भी किसी को कोई डर नही है लेकिन कानून से नही तो उस ईश्वर से तो डरो जो इस संसार का संचालक है।अंत मे सिर्फ इतना ही कि "सबको जीने का अधिकार है" जय हिंद #warehouse mind.